जहां न पहुँचे सरकार- वहाँ पहुँचें पत्रकार
वीरेंद्र पाठक
पूर्व सैनिक बैंक अधिकारी
हमारे देश के पत्रकार अदम्य साहस के परिचायक हैं, वीरप्पन जैसे
दुर्दान्त तस्कर हों या अपराधी, माफिया, आतंकवादी या फिर हिडमा सरीखे
नक्सली कमांडर, ये लोग सुगमता से उन तक पहुँच कर उनका साक्षात्कार करने में
सहज ही सफल हो जाते हैं। कुछ महीने पहले Zee News के एक पत्रकार ने मेवात
में नक़ली दूध बनानेवाले का विडियो इन्टर्व्यु प्रसारित किया था जिसमें
स्पष्टत: दिखाया गया कि किस तरह कैमिकल से नक़ली दूध बनाया जाता है,
उन्होंने यह भी बताया कि उनके पास कोई दुधारू पशु नहीं है वो केवल नक़ली
दूध बनाकर दिल्ली NCR में कई टैंकर दूध सप्लाई करते हैं। ये सब सरकार की
नाक तले हो रहा है, परन्तु सरकार व प्रशासन की आँख न जाने क्यों बन्द हैं,
मिडिया तो ऐसे तत्वों तक आसानी से पहुँच सकता है, WHO इस बात पर अपनी
प्रतिक्रिया दे सकता है, सरकारी तन्त्र कोई कदम नहीं उठा सकता, क्यों न इस
सब को सरकारी तन्त्र द्वारा पोषित प्रोग्राम माना जाए व भ्रष्टाचार मुक्त
भारत का सपना केवल भ्रम ही मान कर रहा जाए।
हाल
ही में एक युवा साहसी पत्रकार ने तो कमाल के साहस का परिचय देकर साक्षात
करोना से साक्षात्कार कर प्रकाशित कर डाला, साक्षात्कार में करोना ने निम्न
उल्लेख किये:-बताया कि विकसित देशों के अपने मिशन के दौरान उसे भारत की
तुलना में अनेकों कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, वहाँ की सुदृढ़ व्यवस्था,
लोगों का अनुशासित व चरित्रवान होना आदि, परन्तु इस देश में कुव्यवस्था,
अनुशासनहीनता, भ्रष्टाचार व धर्मों ने मेरे मिशन में अत्याधिक सहयोग दिया।
सरकार अगर मेरे मिशन के विरुद्ध कोई प्रयास करना भी चाहती तो विपक्ष देशहित
को ताक पर रख कर मुझे पूर्ण सहयोग करता, लोगों को भड़का कर पलायन करवा
मेरा काम आसान करता, आवश्यक दवाओं व सामग्रियों के कालाबाज़ारियों ने बढ़
चढ़ कर मेरा साहस वर्धन किया, धर्म या धार्मिक उत्सवों ने तो मेरे वारे
न्यारे ही कर दिये, क्या तबलिगी जमात, क्या तीर्थ यात्राएँ, कुम्भ से लेकर
कलश यात्राओं तक सभी का तो मैं ऋणी हो गया, परन्तु कहीं तो मैं भी शर्म से
पानी-पानी हो जाता जब देखता था कि एक तरफ़ तो मेरे घात से मृतकों के दाह
संस्कार पर विलाप करते परिजन, व ठीक उसके बग़ल में ऊँचे स्वरों वाले डी जे
की गूंज पर नाचते गाते बाराती। मानव नीचता की ये पराकाष्ठा मुझ जैसे दानव
को भी द्रवित कर देती, मेरे विरुद्ध तय किये गए सुरक्षा नियमों को मैंने
यहाँ तार तार होते देखा।
एक नियम को छोड़कर, नियमों की सूची में इस एक नियम
का नाम है सोशल डिस्टैंसिंग ( सामाजिक दूरी) जिसका पालन तो भारत में बहुत
पहले से ही हो रहा है, मैंने भी अनुभव किया कि वास्तव में नेता व जनता में
यहाँ कितनी दूरी है, भरपूर प्रयास के बाद भी मैं किसी नेता या अभिनेता को
संक्रमित नहीं कर पाया, कारण है ये लोग तो अपने महल के परकोटे (छज्जे) से
ही जनता से मिलते हैं, जब किसी से सम्पर्क होगा नहीं तो संक्रमण कैसे होगा?
जिन नेताओं या अभिनेताओं ने कोविड पाजिटिव होने का दावा किया वो सब उनके
पब्लिसिटी स्टंट थे, वास्तविकता तो मैं जानता हूँ, मेरा नाम तो उन्होंने
अपनी लोकप्रियता मापने के यन्त्र के रूप में प्रयोग किया, वरना मेरी पकड़
तो मकर से भी अधिक मज़बूत है जिसमें आने के बाद बच पाना सम्भव नहीं।
मेरे विरुद्ध रोग रोधक दवा के प्रयोग का निहित स्वार्थियों ने जम कर
विरोध किया, वैक्सीन न लेने के लिए भड़काया, जनता की अन्ध भक्ति वो चाहे
धर्म गुरुओं के प्रति हों या नेताओं के प्रति, मुझे बहुत रास आई।
पहली दौर में तो मुझे लगा कि यहॉ मेरी दाल कम गलेगी, पूरे देश में
ताली व थाली बजाई, दिए जलाए, मैं तो समझा कि यह सब मेरे स्वागत में हो रहा
है पर यह तो मेरे बहिष्कार का एक जुमला था, लोग को घरों में बन्द रहने के
फ़रमान हुए, मुँह नाक ढक कर रहने का आदेश हुआ, बाज़ार बन्द कर दिये गए, सभी
तरह के यातायात पर बंदिश लगा दी, पर जैसे ही मेरा प्रकोप कम होता दिखा तो
सब लोग ऐसे बे डर हो गए जैसे कुछ हुआ ही न हो, मैं दोबारा और भयानक रूप
लेकर आया, मेरा क़हर इतना क़ातिलाना था कि चारों तरफ़ हाहाकार मच गया,
अस्पतालों में न जगह, न आक्सीजन व ज़रूरी दवा बाज़ार से ग़ायब हो गई, कितने
ही लोगों में अपनों को खो दिया, कहीं तो पूरे के पूरे परिवार बर्बाद होकर
रह गए, मगर धन्य हैं भारत के जयचन्द, जो प्रत्यक्ष रूप से मेरे सहयोग में
जुटे रहे, लोगों को गुमराह करते रहे, मुझे तरस भी आता है यहाँ के लोगों की
मति पर जो आँख मूँदकर इन निहित स्वार्थी लोगों के पीछे चलते रहे।
दूसरा दौर अभी समाप्त भी नहीं हुआ और नियमों में जरा सी ढील क्या
मिली कि लोग स्वतन्त्रता अनुभव कर मेरे विरुद्ध तय किए सभी नियमों की जमकर
धज्जियाँ उड़ाने लगे। मेरा नया रूप देखने को इतने बेचैन लोग मुझे पूरी
दुनिया में कहीं नहीं मिले, मेरे नये रूप की तीसरी लहर की कड़ी चेतावनी के
बावजूद लोग फिर से मेरे स्वागत सत्कार के लिए जी जान से लगे हैं इन लोगों
का उत्साह देखते ही बनता है।
यहाँ के आतिथ्य
ने मेरा तो मन मोह लिया, एक आदमखोर का इतना सत्कार देख कर तो मन यहीं बस
जाने को करता है पर विवश हूँ, विश्व विजय के मिशन पर जो हूँ, फिर भी
विभिन्न रूप धारण कर बार बार यहाँ आने की कोशिश करता रहूँगा..............
अगर यहाँ के लोग न संभले तो!
मेरी इस व्यंग्य रचना का प्रेरणास्रोत हम लोगों का चिर परिचित व्यवहार व अनुशासनहीनता का अनुभव है।
प्रस्तुति:
पवन अग्रवाल, करनाल

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